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विषय नं. 6 - ईश्वर के गुण



अध्याय नं. 13 ,श्लोक नं. 14
श्लोक

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥14॥

सर्वतः पाणि पादम् तत् सर्वतः अक्षि शिरः मुखम् ।
सर्वतः श्रुति-मत् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति
।। १४ ।।

शब्दार्थ

(तत्) उस (ईश्वर के) (पाणि) हाथ (पादम्) पैर (सर्वतः ) हर दिशा में हैं (अर्थात उसकी पकड़ हर स्थान पर है) (अक्षि) आँखे (शिरः) सिर (मुखम्) और मुख है (अर्थात हर वस्तू पर उसकी नज़र है) (सतते) हर तरफ (लोके) ब्रह्मांण्ड में (श्रुति-मत्) उसके कान है (अर्थात वह हर एक कि सुनता है) (सर्वम्) सबकी (आवृत्य) रचना करके (निर्माण करके) (तिष्ठति) वह स्थित है। (हर चिज़ उसके नियंत्रण में है)

अनुवाद

उस (ईश्वर के) हाथ पैर हर दिशा में हैं (अर्थात उसकी पकड़ हर स्थान पर है)। हर तरफ (उस ईश्वर की) आँखे, सिर और मुख है (अर्थात हर वस्तु पर उसकी नज़र है)। हर तरफ ब्रह्मांण्ड में उसके कान है, (अर्थात वह हर एक की सुनता है)। सबकी रचना करके (निर्माण करके) वह स्थित है। (हर चीज़ उसके नियंत्रण में है)